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18 हजार करोड़ का ‘DMF खेल’: 1.13 लाख प्रोजेक्ट्स के नाम पर कमीशनखोरी का साम्राज्य, आदिवासियों के हक पर सबसे बड़ा डाका !”

18 हजार करोड़ का ‘DMF खेल’: 1.13 लाख प्रोजेक्ट्स के नाम पर कमीशनखोरी का साम्राज्य, आदिवासियों के हक पर सबसे बड़ा डाका !”

रायपुर। खनिज संपदा से समृद्ध छत्तीसगढ़ में जिला खनिज न्यास (DMF) फंड को लेकर सामने आ रही तस्वीरें बेहद चौंकाने वाली हैं। सरकारी आंकड़ों और हालिया विश्लेषण के मुताबिक, राज्य में अब तक 18,234 करोड़ रुपये की लागत से 1,13,394 कार्य स्वीकृत किए जा चुके हैं, जबकि खनन कंपनियों की रॉयल्टी से 14,776.56 करोड़ रुपये की भारी-भरकम राशि इस फंड में जमा हो चुकी है। कागजों पर यह आंकड़े विकास की बड़ी कहानी बताते हैं, लेकिन जमीनी हकीकत इन दावों को कठघरे में खड़ा करती नजर आती है।

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DMF फंड का मूल उद्देश्य खदानों से प्रभावित आदिवासी और स्थानीय समुदायों के जीवन स्तर को बेहतर बनाना था, ताकि उन्हें स्वास्थ्य, शिक्षा और रोजगार जैसी बुनियादी सुविधाएं मिल सकें। लेकिन अब यही फंड भ्रष्टाचार के आरोपों में घिरकर सवालों के केंद्र में आ गया है। आरोप है कि योजनाओं की आड़ में बड़े पैमाने पर अनियमितताएं की गईं, जिसमें टेंडर प्रक्रिया से लेकर भुगतान तक हर स्तर पर ‘सेटिंग’ और ‘कमीशन’ का खेल चलता रहा।

मामले की गंभीरता को देखते हुए प्रवर्तन निदेशालय (ED) और आर्थिक अपराध अन्वेषण शाखा (EOW-ACB) जैसी जांच एजेंसियों ने अपनी कार्रवाई तेज कर दी है। जांच में जो तथ्य सामने आए हैं, वे इस पूरे सिस्टम पर गंभीर सवाल खड़े करते हैं। कोर्ट में पेश की गई करीब 6000 पन्नों की चार्जशीट में यह दावा किया गया है कि ठेके दिलाने के बदले 15% से लेकर 40% तक कमीशन वसूला गया। यह कमीशन किसी एक स्तर पर नहीं, बल्कि पूरे नेटवर्क के जरिए व्यवस्थित तरीके से लिया जाता था, जिसमें अधिकारियों, बिचौलियों और ठेकेदारों की मिलीभगत बताई जा रही है।

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जांच एजेंसियों के अनुसार, DMF फंड को एक तरह से ‘ATM’ की तरह इस्तेमाल किया गया। कोरबा समेत कई जिलों में चहेते ठेकेदारों को लाभ पहुंचाने के लिए टेंडर में हेरफेर, फर्जी कंपनियों के जरिए बिलिंग और सरकारी संस्थाओं के माध्यम से धन की बंदरबांट के मामले सामने आए हैं। कई प्रोजेक्ट्स ऐसे भी बताए जा रहे हैं, जो या तो कागजों पर ही पूरे दिखा दिए गए या फिर उनकी गुणवत्ता इतनी खराब रही कि वे उपयोग के लायक ही नहीं बचे।

इस बहुचर्चित मामले में कई बड़े नाम भी जांच के घेरे में आए हैं। पूर्व आईएएस अधिकारी अनिल टुटेजा, रानू साहू और पूर्व सीएमओ अधिकारी सौम्या चौरसिया सहित कई प्रभावशाली अधिकारियों और ठेकेदारों पर कार्रवाई हो चुकी है। इन पर न सिर्फ गिरफ्तारी की गाज गिरी है, बल्कि करोड़ों रुपये की संपत्तियां भी कुर्क की गई हैं, जिससे यह साफ होता है कि मामला महज अनियमितताओं का नहीं, बल्कि एक बड़े संगठित आर्थिक अपराध का रूप ले चुका है।

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सबसे चिंताजनक पहलू यह है कि जिस फंड को आदिवासियों और खनन प्रभावित लोगों के विकास के लिए बनाया गया था, उसी फंड के उपयोग पर सबसे ज्यादा सवाल उठ रहे हैं। हजारों करोड़ रुपये खर्च होने के बावजूद कई इलाकों में बुनियादी सुविधाओं का अभाव बना हुआ है। स्वास्थ्य केंद्र अधूरे हैं, स्कूलों की स्थिति खराब है और रोजगार के अवसर सीमित ही बने हुए हैं। ऐसे में यह सवाल लगातार उठ रहा है कि आखिर यह पैसा गया कहां और किसके हित में खर्च हुआ।

विशेषज्ञों का मानना है कि बिना स्वतंत्र ऑडिट और पारदर्शी जांच के इस पूरे मामले की सच्चाई सामने आना मुश्किल है। अभी तक जो परतें खुली हैं, वे इस बात का संकेत देती हैं कि DMF फंड के जरिए बड़े पैमाने पर आर्थिक गड़बड़ी हुई है, लेकिन इसकी गहराई और दायरा इससे कहीं ज्यादा बड़ा हो सकता है।

फिलहाल, जांच जारी है और आने वाले समय में और बड़े खुलासों की उम्मीद जताई जा रही है। इतना जरूर साफ है कि छत्तीसगढ़ में DMF फंड को लेकर जो तस्वीर सामने आई है, उसने विकास और पारदर्शिता के दावों पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं। यह मामला अब सिर्फ एक घोटाले तक सीमित नहीं रहा, बल्कि यह उस व्यवस्था की कहानी बन चुका है, जहां जनता के हक का पैसा ही सबसे आसान शिकार बन जाता है।

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